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Towards A Non-Violent Modernity/ अहिंसक आधुनिकता की ओर

Purushottam Agrawal's Ahimsa Day Lecture Jan 2010 at IP College, Delhi

Ahinsak Aadhuniktaa Ki Or



ईमानदारी की बात तो यह है कि गाँधीजी के बारे में दिलीप का व्याख्यान सुनने के बाद, उनके अंतिम उपवास के बारे में सुनने के बाद, मैं बोलने के लिए बहुत उत्सुक नहीं हूँ। मैं तो चाहता हूँ कि गाँधीजी के अंतिम उपवास का, उस दौरान उनके आचरण का जो चित्र हमारे सामने आया है, हम सब उसे मौन रह कर, शांत भाव से उस पर सोचें, उसे मन में उतरने दें। सचमुच लगता है कि मेरे भीतर और मेरे आस-पास इतने सारे शब्द हैं, जिन्हें सुनने और सुनाने के लिये मैं इतना व्याकुल रहता हूँ... लगता है कि सचमुच चुप रहने की, मौन साधने की कुछ तो ट्रेनिंग हम लोगों को अपने आप को देनी ही चाहिए। मैं आज के कार्यक्रम की अध्यक्ष बबली से कहूँगा कि अभी तक हमने जो सुना है, उस पर कुछ देर मौन रह कर गौर करें, और फिर अपने इन दोनों वक्ताओं से बात करें...

आप लोगों को लग रहा होगा कि मैं विनम्रता का नाटक कर रहा हूँ, या शायद अपना भाव बढ़ा रहा हूँ... लेकिन मुझे बहुत दिनों से जानने वाले जानते हैं कि विनम्रता का दुर्गुण मुझमें बिल्कुल नहीं है, इसलिये ऐसी कोई बात है नहीं। खैर, छोड़िये...

जो विषय मैंने तय किया था - “अहिंसक आधुनिकता की ओर”- उसे इस तरह रखें कि सबसे पहले तो समझने की कोशिश करें कि आधुनिकता से हमारा आशय क्या है, और अहिंसक शब्द से हमारा मतलब क्या है। मेरे चुने विषय में इंप्लाइड है कि वर्तमान आधुनिकता को मैं हिंसक आधुनिकता मानता हूँ और अहिंसक आधुनिकता की ओर बढ़ने का प्रस्ताव कर रहा हूँ। वैसे, कुछ भी कहने के पहले यह कह देना जरूरी है कि जो कुछ अगले बीस-पचीस मिनट में मैं कहने जा रहा हूँ, वह जरूरी तौर से गाँधीजी के महत्त्व के बारे में नहीं है। मैं गाँधीजी को कोई मसीहा नहीं, बल्कि एक प्रस्थान-बिंदु मानता हूँ, इसलिए जब जरूरी लगे तब उनसे भी बहस करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होती।

आधुनिकता के प्रसंग में सबसे पहली बात यह समझनी चाहिए कि आम तौर से आधुनिकता को परंपरा के विरुद्ध या कम से कम ऐसी चीज माना जाता है, जिसका परंपरा से सहज संबंध है नहीं। ऐसा माना जाता है कि परंपरा एक खास तरह का मिजाज है, और आधुनिकता उसका विरोधी मिजाज सूचित करती है। खासकर हिन्दुस्तान जैसे देश के बारे में समझा जाता है कि जहाँ से परंपरा जाती है, वहीं से आधुनिकता आती है। इस पूरी मान्यता पर हमें पुनर्विचार करना होगा, और गाँधीजी का जीवन इस मान्यता पर पुनर्विचार का जबर्दस्त उदाहरण है।

गाँधीजी के बारे में बहुत से लोगों को लगता है, जैसे कि वे कहीं आसमान से टपक पडे़थे। ऐसा है नहीं। गाँधीजी चिंतन और व्यवहार की एक पूरी परंपरा का स्वाभाविक परिणाम थे। मैं नहीं जानता कि आपमें से कितने लोग हिन्दी राष्ट्रीय दायित्व के तौर पर नहीं, बल्कि सहज रूप से पढ़ते हैं। जो भी लोग पढ़ते होंगे, उन्होंने संभवत: आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का नाम सुना होगा। परशुराम चतुर्वेदी भक्ति साहित्य के स्कॉलर थे, उन्होंने एक किताब लिखी है- ‘उत्तरी भारत की संत परंपरा’। स्वाभाविक रूप से किताब आरंभ होती है, गोरखनाथ से, कबीर के बारे में उसमें काफी तफसील से बात की गयी है, और भी लोगों के बारे में की गयी है। लेकिन जो मुझे बेहद महत्वपूर्ण लगता रहा है, वह यह कि चतुर्वेदीजी के अनुसार उत्तर भारत में संत परंपरा जो थी, उसके अंतिम महत्वपूर्ण व्यक्ति थे- मोहनदास करमचंद गाँधी। उसमें पूरा एक अध्याय गाँधीजी पर है। स्वयं गाँधीजी इतिहास में सबसे पहला सत्याग्रही मीराबाई को मानते थे। वो मानते थे कि मेरे जीवन में, मेरे सबसे निकट जो सबसे पहला सत्याग्रही है, वो मेरी पत्नी है, और इतिहास में देखें तो पहली सत्याग्रही मीराबाई हैं। गाँधीजी के बारे में बात करते हुए इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है कि वे बहुत सहज रूप से खुद को सनातनी हिन्दू इसीलिए कह सकते थे क्योंकि वे इस परंपरा का स्वाभाविक विकास थे।

इससे जो बात मुझे सूझती है, वो यह कि हर परंपरा में आधुनिकता की संभावना होती है, और हर आधुनिकता की एक परंपरा होती है। परंपरा कोई गठरी नहीं है, जिसे कुछ समाज तो अब तक ढो रहे हैं, और कुछ समाज कहीं पीछे फेंक आए हैं। इसी तरह आधुनिकता कोई स्वाइन फ्लू सरीखा वायरस नहीं है कि पहले यूरोप में फैला और फिर यूरोप की छूत से सारी दुनिया में फैलता चला गया। हर समाज की पंरपरा में, आधुनिकता में आत्मसंघर्ष होते हैं। इस बात को समझना जरूरी है, खासकर गाँधीजी के संदर्भ में, कि हमारे परंपरा-बोध और आधुनिकता-बोध मे किस तरह की समस्याएं अंतर्निहित हैं। ऐसी समस्याओं का एक दिलचस्प उदाहरण मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ। सन 1994 में ‘सहमत’ की गोष्ठी में प्रो. इरफान हबीब ने भाषण दिया था, जो ‘सोशल साइंटिस्ट’ में प्रकाशित हुआ है। प्रो. हबीब ने कहा कि आधुनिक पाश्चात्य चिंतन ही वह पहला गंभीर विमर्श था, जिससे गाँधीजी परिचित हुए। आजकल एक शब्द साहित्य के विद्यार्थियों के बीच बहुत प्रचलित है - ‘डिकंस्ट्रक्शन’। इस वाक्य को डिकंस्ट्रक्ट किया जाए तो इसका मतलब होगा कि पाश्चात्य चिंतन के संपर्क में आने के पहले जिन भक्त कवियों को गाँधीजी ने पढा़ था, उनमें कोई गंभीर विमर्श नहीं था। जो भी गंभीर विमर्श है, वह केवल पाश्चात्य चिंतन में ही हो सकता है! उसी भाषण में इरफान हबीब का दूसरा वक्तव्य है कि गाँधीजी ने हिन्दू धर्म को एकेश्वरवादी बनाने के लिए आर्य-समाजियों से भी अधिक प्रयत्न किया। मैं पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूँ कि गाँधीजी के बारे में इससे अधिक हास्यास्पद वक्तव्य खोज पाना मेरे लिये बहुत मुश्किल साबित हुआ है। मैंने जो भी थोडा़ बहुत पढा़ है, उस सबमें इससे अधिक विचित्र वक्तव्य मुझे गाँधीजी के बारे में नहीं मिला। गाँधीजी और जो भी रहे हों, आर्य-समाजियों सरीखे एकेश्वरवादी तो हरगिज नहीं थे। आर्य-समाजियों की जो परंपरा की धारणा थी, उससे तो गाँधीजी का सीधा विरोध था। आर्य-समाज मानता था कि जो भी आस-पास उपलब्ध है, लिव्ड ट्रैडीशन में या इमीजिएट पास्ट में उपलब्ध है, हमारे आस-पास की, रोजमर्रा की जिन्दगी में, एवरीडे प्रैक्टिस में उपलब्ध है, वह सब त्याज्य है, गंदा है। जो श्रेष्ठ है, वह तो बस वेदों में है। इसीलिए, आप ‘सत्यार्थप्रकाश’ में देखेंगे कि दयानंदजी ने बहुत कडे़ शब्दों में कबीर के बारे में लिखा है, नानक और तुलसीदास के बारे में लिखा है। मीराबाई को तो उन्होंने इस लायक भी नहीं समझा कि उन पर कोई टिप्पणी करें। इस तरह का एकेश्वरवाद हिन्दू परंपरा में लाने का कोई प्रयत्न गाँधीजी ने कभी नहीं किया। इरफान हबीब का यह भी कहना है, मैं उनका वाक्य पढ़ रहा हूँ - “इस बात को याद रखना जरूरी है कि गाँधीजी की बौद्धिक बुनावट के रेशे निश्चित ही पूरी तरह आधुनिक हैं। उनका यह विश्वास कि इन (आधुनिक) चिंतकों के लेखन ने पहले से उनके मन में मौजूद भारत की अपनी परंपराओं के सरोकारों को पुष्ट किया, निश्चय ही संदिग्ध है”।

मतलब यह कि गाँधीजी पर वहाँ तो भरोसा करना चाहिए जहाँ वे कहते हैं कि मुझ पर टॉल्स्टॉय का, थोरो का, रस्किन का बहुत प्रभाव पडा़; लेकिन जब वही गाँधीजी कहें कि मुझे कबीर ने बनाया, तुलसी ने बनाया, भगवद्गीता ने बनाया तो गाँधीजी की ईमानदारी संदिग्ध है। मेरे जैसा कम पढा़-लिखा आदमी ऐसी बातों पर यही कह सकता है कि ‘मीठा-मीठा हप, कड़वा-कड़वा थू’। दोस्तो, यहाँ सवाल केवल गाँधीजी और केवल इरफान हबीब का नहीं है, सवाल परंपरा की अवधारणा का है, उसके प्रति रवैये का है। सवाल यह मानने का है कि आधुनिकता केवल अंग्रेजी के ही जरिए आ सकती है। सवाल आधुनिकता के किसी न किसी यूरोपीय संस्करण का अंधानुकरण और ऐसे अंधानुकरण से होने वाले नुक्सान का है। और यह बात, मैं केवल भारत के संदर्भ में नहीं कह रहा हूँ।

आजकल मैं ऐसी संस्था से संबद्ध हूँ जो इस देश के असली भाग्य-विधाता हर साल पैदा करती है। आई.ए.एस. अफसरों की टोली में शामिल होने जो नौजवान आते हैं, ब्यूरोक्रेसी के बारे में पूछने पर मैक्स बेवर के बारे में मेरा काफी ज्ञानवर्द्धन करते हैं। जब उनसे पूछता हूँ कि इस इंपर्सनल किस्म की ब्यूरोक्रेसी का आविष्कार कहाँ हुआ था, तो ज्यादातर को चीन का नाम नहीं सूझता। और यह पूछ लेने पर तो कि सिर्फ आविष्कार ही कर लिया, या चीनियों ने नौकरशाही पर कुछ सोच-विचार भी किया, आज तक कोई उम्मीदवार कुछ नहीं कह सका है। यानी आजकल कितने भी आगे बढ़ गये हों, पुराने जमाने के चीनी तो बस अफीमची ठहरे। क्या तो वे ब्यूरोक्रेसी का आविष्कार करते, क्या उस पर सोच-विचार करते। सोच-विचार का काम तो बस यूरोपियन ही कर सकते थे न!

कुछ लोगों को मेरी बातें अटपटी लग रही होंगी, लग रहा होगा कि मैं काफी कड़वाहट के साथ बोल रहा हूँ, लेकिन इसके लिये मैं माफी ही माँग सकता हूँ । परंपरा का जो बोध हमने बना लिया है, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, आधुनिकता का जोबोध हमने बना लिया है, उस बोध के चलते हम आधुनिकता को मूल्यों के आधार पर नहीं, भाषा और भूगोल के आधार पर पहचानने के आदी हो गये हैं। हम आधुनिकता को इस आधार नहीं पहचानते कि किसी समाज में संगठित धर्म का विरोध कब, किस ऐतिहासिक बिंदु पर आरंभ हुआ, रोजमर्रा की जिन्दगी की भाषा ही भगवान के साथ संबंध भी बनाने की भाषा कब से बनी। हम तो आधुनिकता को इस आधार पर पहचानते हैं कि यूरोप के किस देश का गुलाम बनने का सौभाग्य किस देश को कब प्राप्त हुआ। फ्रांस का उपनिवेशवाद अफ्रीका पहुँचा तो वहाँ आधुनिकता आरंभ हो गयी, इंग्लैंड का उपनिवेशवाद भारत आया तो यहाँ आधुनिकता आरंभ हो गयी। स्पेन की कृपा से तथाकथित लैटिन अमेरिका में आधुनिकता आरंभ हो गयी।

आधुनिकता की इसी अवधारणा से वैसी बातें पैदा होती हैं, जैसी इरफान हबीब गाँधीजी के प्रसंग में कहते हैं। ऐसी बातें करने वाले यह तक भूल जाते हैं कि जिन चिंतकों का ऋण गाँधीजी स्वीकारते हैं, उनमें से कोई भी तथाकथित आधुनिकता का प्रवक्ता नहीं था। थोरो, टॉल्स्टॉय, रस्किन तीनों ही उस आधुनिकता के आउटसाइडर थे। इसलिए जब हम आधुनिकता की बात करें तो याद रखें कि जिसे हम आधुनिकता समझते हैं, उसका गहरा संबंध साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से है। और किस तरह यह आधुनिकता संगठित रूप से जन-जीवन में पहुंचाई गयी, उसकी चर्चा करते हुए अमिता अभी बता रही थीं कि किस तरह लोगों को चाय पीने के लिए लुभाया जाता था। मुझे उनकी बात सुनते हुए भीष्म साहनी का उपन्यास ‘मय्यादास की माडी़’ याद आ रहा था। उसमें एक प्रसंग है कि पंजाब के गाँवों में सिगरेटें बाँटी नहीं, बल्कि फेंकी जाती थीं। गाडि़यां निकल रही हैं, उनसे सिगरेटें फेंकी जा रही हैं, बच्चे पैकेट लूट रहे हैं। खैर, तो आधुनिकता के बारे में सबसे पहली बात तो यही है कि आधुनिकता और यूरोपीयता पर्यायवाची नहीं हैं।

ऐसी कोई पंरपरा हो ही नहीं सकती, जिसमें आधुनिकता की ओर बढ़ने का आत्मसंघर्ष न हो। गाँधीजी भारतीय परंपरा में चल रहे ऐसे आत्मसंघर्ष की परिणति थे, आरंभ नहीं। वे ऐसे संघर्ष को अपने जीवन और कर्म में धारण करने वाले पहले व्यक्ति नहीं, उस संघर्ष के विकास की एक मंजिल थे। इसी अर्थ में, मैंने कहा मित्रो, कि गाँधीजी कोई प्राफेट नहीं थे। वे मूर्खों के बीच सत्य की मशाल लेकर खडे़ हो गये व्यक्ति नहीं थे। जिन बातों को लेकर हम कभी उनका गुणगान करते हैं, कभी उन पर चकित होते हैं, कभी उन्हें कोसते हैं, वे बातें लाखों अपढ़ हिन्दुस्तानियों के लिए बिल्कुल सहज थीं, और हैं। गाँधीजी का वक्तव्य प्रसिद्ध है, और उस पर जिन्नाह की टिप्पणी भी उतनी ही प्रसिद्ध है। गाँधीजी ने कहा था, ‘मैं हिन्दू हूँ, मुसलमान हूँ, ईसाई हूँ’ और जिन्नाह ने चिढ़ कर कहा था, ‘केवल एक हिन्दू ही ऐसा कह सकता है’। बिल्कुल ठीक कहा था, जिन्नाह ने। इसका मुझे निजी अनुभव है।

मेरे स्वर्गीय बड़े भाई हिन्दू राष्ट्रवादी थे। एक बार घर में ईसा मसीह की तस्वीर आ गयी, जाहिर है कि मुझ अपराधी के कारण। बडे़ भाई लाल-पीले हो गये। मेरी पिटाई तो खैर की ही, तस्वीर जलाने पर भी आमादा हो गये। ऐसी स्थिति में आमरण अनशन और उपवास के सिवाय क्या सूझ सकता है आपको? मैंने धमकी दी, ऐसा कुछ हुआ तो मैं खाना-पीना छोड़ दूंगा। माँ ने रास्ता निकाला। ईसा की तस्वीर बडे़ भाई के हाथ से छीनी और ले जाकर अपने पूजाघर में रख दी, और पूजाघर कम से कम मेरे घर में किसी भी तरह की गुंडई और बदमाशी के परे था। किसी भी तरह का पॉलिटिकल प्रोजेक्ट किसी पूजा-स्थल को ध्वस्त करने को कम से कम मेरे घर में जायज नहीं ठहरा सकता था। इसलिए जब तक मेरी माँ जिंदा रही, ईसा मसीह उस पूजाघर में रोली-चावल प्राप्त करते रहे, भोग प्राप्त करते रहे, आनंद करते रहे। माँ चली गयी तो ईसा मसीह को भी जाना ही था।

गाँधीजी का जो वक्तव्य जिन्नाह को खिझाता है, वह मेरी माँ को अटपटा नहीं लगता, मुझे अटपटा नहीं लगता। इसीलिए मैं कहता हूँ, गाँधीजी जैसे व्यक्ति ही अपनी परंपरा से सहज रूप से संबद्ध रहते हुए भी, उसके प्रति कठोर आलोचनात्मक रवैया अपना सकते थे, क्योंकि वे परंपरा से जुडे़ हुए थे। हममें से अधिकांश लोग जो भारत का या दुनिया के किसी भी हिस्से का उद्धार करना चाहते हैं, परंपरा में या तो अतिथि की तरह कभी-कभार चले जाते हैं, या फिर सीधे उद्धार करने निकल पड़ते हैं कि चलो इन अज्ञानियों, मूर्खों को बचा लें। हम लोग सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलन में काम करते थे। एक बार मैंने प्रस्ताव किया कि पाखंड-खंडिनी पताका लगा कर बैठें। लोगों को बहस के लिए आमंत्रित करें।

मैंने तो सोचा था कि साधारण सा प्रस्ताव है, सबको पसंद ही आएगा। लेकिन वहाँ तो बहस होने लगी कि साहब इस शब्द में तो हिन्दुत्व की गंध आती है, यह तो सांप्रदायिक है। खैर, साहब किसी तरह गंध-दुर्गंध से पीछा छूटा और मान लिया गया कि पाखंड-खंडिनी पताका लगायी जाएगी, लगाई गयी, लेकिन हमारे बहुत से दोस्त पताका को लगातार 'पटाका' ही कहते रहे। कारण यह कि बेचारे नागरी तो पढ़ते नहीं थे, हिन्दी शब्दों को भी रोमन के जरिए ही पहचान पाते थे, और सुधारना उन्हें चाहते थे, जो नागरी के सिवाय कुछ नहीं पढ़ते। पूछते थे मुझसे, ‘सो, पुरुषोत्तम, हाउ अबाउट यौर पटाका’। सुनकर मेरी खोपडी़ में पटाके चलने लगते थे।

दूसरी तरफ, अभी दिलीप ने बहुत मार्मिक बात कही गाँधीजी के बारे में। एक तरफ कुछ लोग कहते थे - ‘मरने दो गाँधी को’, तो दूसरी तरफ हिन्दू महासभा वाले लिख कर देते थे कि हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे कि गाँधीजी का जीवन संकट में पडे़। कारण यह कि सब कुछ के बावजूद, क्या हिन्दू क्या मुसलमान, सबको लगता था कि कितना भी अजीब हो यह आदमी, अपना है। और हममें से अधिकांश, सारे नेक इरादों के बावजूद न औसत हिन्दू को अपने लगते हैं, न औसत मुसलमान को। और फिर हम बैठ कर छाती पीटते रहते हैं कि हमारे जैसे महान उद्धारकों के होते हुए भी देश और दुनिया का सत्यानाश हो रहा है।

आधुनिकता की बात हमने थोड़ी बहुत की। अहिंसक आधुनिकता की बात करते हुए मैं गाँधीजी का एक उद्धरण पढ़ना चाहता हूँ, और बस मैं अपनी बात समाप्त करूँगा। बहुत से लोगों को लगता है कि गाँधीजी अहिंसा पर कुछ ज्यादा ही बल देते थे। मुझे याद है आज तक, एक बार दिलीप बोल रहे थे - जेएनयू में। दिलीप मेरे प्रिय वक्ताओं में से हैं, नेता हैं मेरे, जहाँ बोलते हैं, मौका मिलता है तो मैं सुनने चला जाता हूँ, तो, उस दिन इन्होंने कुछ कहा नॉन-वॉयलेंस के बारे में, आप जानते ही हैं, जेएनयू बडे़ गुणी और विद्वान लोगों का विश्वविद्यालय है, ऐसे ही एक सज्जन खडे़ हुए और दिलीप से बोले –‘हाउ कैन यू सो वॉयलेंटली क्रिटिसाइज वॉयलेंस?’ हाँ, सचमुच। यह वाक्य मैं आज तक भूल नहीं पाया हूँ। खैर, तो कुछ लोगों को लगता है कि गाँधीजी हिंसा-अहिंसा को बहुत कैजुअली ही समझते थे, और हवाई बातें करते थे। असल में गाँधीजी के व्यक्तित्व का फ़लक इतना व्यापक और रंगीन है, कि उसमें से बेवकू़फ़ लोग भी अपने मतलब की बात निकाल सकते हैं, और समझदार लोग भी। इसीलिए कुछ लोगों का सारा गाँधीवाद बस इतने से सिद्ध हो जाता है कि दूध और छुहारे के सिवाय कुछ न खाया जाए। कुछ लोग गाँधीवाद के नाम पर सारी जिंदगी भर शराब पीने वालों को ही सुधारते रह जाते हैं। इसीलिए, शायद, जब गाँधीजी के अंतिम दिनों में नारे लगते थे कि ‘गाँधीवाद हो बर्बाद’, तो गाँधीजी छूटते ही कहते थे कि ‘हाँ, यह एक बात है, जिससे मैं सौ फी़सदी सहमत हूँ’।

गाँधीजी का वह भाषण पिछले दिनों छपा है ‘गाँधी-मार्ग’ में, जिसमें उन्होंने विस्तार से बताया है कि गाँधीवाद जैसी कोई चीज अगर है, तो उसे बर्बाद हो ही जाना चाहिए। खैर, तो, अपनी आत्मकथा में गाँधीजी ने अहिंसा के बारे में बहुत ही मार्के की बात कही है, मैं वह बात पढ़ना चाहता हूँ, और प्रार्थना करूंगा मित्रो कि हम बहुत ध्यान से उस बात को सुनें - “अहिंसा व्यापक वस्तु है। हिंसा की होली की लपेट में आए हम सब पामर प्राणी हैं। जीवै जीव आहारा की बात गलत नहीं है। मनुष्य पल भर भी बाहरी हिंसा के बिना नहीं जी सकता। खाते, पीते, उठते, बैठते, सब कामों में, इच्छा से हो या अनिच्छा से, कुछ न कुछ हिंसा तो मनुष्य करता ही रहता है। उस हिंसा से निकलने का उसका महाप्रयास हो, उसकी भावना में अनुकंपा हो, छोटे से छोटे प्राणी का नाश वह न चाहे और यथाशक्ति उसे बचाने की कोशिश करे, तो वह अहिंसा का पुजारी है। उसकी प्रवृत्ति में निरंतर संयम की वृद्धि होगी, उसमें निरंतर करुणा बढ़ती जाएगी। पर कोई देहधारी हिंसा से सर्वथा मुक्त नहीं हो सकता”।

गाँधीजी जानते थे इस बात को, कि हिंसा is a fact of life, the question, he, however is raising is this : ‘whether it should be a value of life as well?’ क्या हिंसा को जीवन का मूल्य, उसका प्रतिमान, उसकी कसौटी भी होना चाहिए? सवाल यह है। प्रकृति ने आपको हिंसा दी है, लेकिन उसी प्रकृति ने आपको विवेक भी दिया है। उसी प्रकृति ने आपको करुणा भी दी है, संयम करने की सामर्थ्य भी दी है। और ये जो दो शब्द हैं - करुणा और संयम, गाँधीजी के हिसाब से अहिंसा इन्हीं से परिभाषित होती है। अमिता अभी जो कह रही थीं... बहुत से लोग आजकल महसूस कर रहे हैं, कोपेनहेगेन में भी पिछले दिनों चर्चा हो रही थी...हमारे एक बहुत ही आदरणीय मित्र हैं, बुजुर्ग हैं- डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा। किताब लिखी है उन्होंने- ‘दि वेब ऑफ पावर्टी’। गणित के विद्वान हैं, ब्रह्मदेवजी। उन्होंने आंकडे़ देकर दिखाया है कि यूरोप और अमेरिका जैसा कंजप्शन पैटर्न यदि भारत पाना चाहे, तो वह असंभव है। मैथेमेटिकली इंपॉसिबल है। वह तभी हो सकता है जब आपके पास एक और धरती हो, और आप उस पर वैसा ही अत्याचार कर सकें, जैसा यूरोपीय आधुनिकता इस धरती के साथ पिछले चार सौ साल से करती आई है।

संयम के बिना कैसे चलेगा? अपनी इच्छाओं और कामनाओं पर संयम किए बिना कैसे चलेगा? अहिंसक होने का अर्थ यह नहीं कि आप आक्रामक किस्म का शाकाहारवाद अपना लें। करुणा और संयम के बिना आप अहिंसक नहीं हो सकते, कितने ही शाकाहारवादी आप क्यों न हों। मैं खुद शाकाहारी हूँ, लेकिन शाकाहारी लोग जितने बदतमीज़ और हिंसक मैंने देखे हैं... यहाँ बैठे सभी शाकाहारियों से माफी माँगता हूँ मैं, इसीलिए मैंने आपको बताया कि मैं पर्सनली शाकाहारी हूँ, मेरा सारा परिवार मांसाहारी है। खुद शाकाहारी हूँ, इसीलिए शाकाहारियों के बारे में कडी़ बात कहने की हिम्मत कर रहा हूँ। आजकल, आइडेंटिटी डिस्कोर्स के जमाने में आप बस अपने बारे में ही कुछ कह सकते हैं। आजकल चलन यह है कि किसी और आइडेंटिटी के बारे में आप कुछ मत कहिए। कहें तो आपसे कहा जाता है कि जी, आप चुप रहिए, वह खुद बोलेगा।

वैसे, इस तर्क से मुझे तो किसी के भी बारे में कुछ नहीं बोलना चाहिए। सवर्ण पुरुष हूँ। मेरा दुर्भाग्य कि किसी उत्पीडि़त आइडेंटिटी से संबंधित नहीं हूँ। हाँ, वैसे एक उत्पीडि़त आइडेंटिटी है मेरी। आम तौर से हिंदी में बोलता हूँ, सो चाहूँ तो कह सकता हूँ कि आप सब अंग्रेजी वाले मिल कर मुझे हड़काते रहते हैं। इसी तर्क से गाँधीजी के बारे में भी मैं कुछ तो कह ही सकता हूँ कि वे भी अंतत: बनिए ही थे। मैं मारवाडी़ हूँ, वे गुजरात के थे। गाँधीजी मुसलमान घर में नहीं जन्मे थे, औरत नहीं जन्मे थे, अछूत नहीं जन्मे थे। लेकिन बोलते इन सबके लिये थे, काम इन सबके लिये करते थे, क्योंकि उनकी धारणा यह थी कि दूसरे का दुख समझे बिना आप स्वयं मनुष्य नहीं हो सकते। दूसरा चाहे व्यक्ति हो, समुदाय हो, परंपरा हो। और यह सोच उन्हें उनके परंपरा के आत्मसंघर्ष से मिला था। ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जे पीर पराई जाणे रे’ – यह भजन गाँधीजी का रचा नहीं है। यह उन्हीं लोगों का रचा भजन है, जो प्रो. इरफान हबीब के अनुसार, गंभीर विमर्श करने के लायक नहीं थे। नरसी मेहता गाँधीजी से चार सौ साल पहले हुए थे, और उनसे गाँधीजी ने यह बोध पाया था कि जब तक आप दूसरे का दुख, पराई पीर नहीं जानते, संवेदना के, और व्यवहार के धरातल पर, तब तक आप वैष्णव नहीं कहला सकते। जब तक आप करुणा और संयम नहीं अपनाते, तब तक आप अहिंसक नहीं कहला सकते।

अहिंसा का अर्थ एग्रेसिव वैजेटेरियनिज्म नहीं होता। जी, हाँ, एग्रेसिव वैजेटेरियनिज्म। मेरी बेटी बता रही थी, एक दिन उसके स्कूल में वह जो एक दूसरी प्रसिद्ध गाँधीजी हैं, नाम-वाम लेने से कोई फायदा नहीं, उनका नाम एक प्रसिद्ध अप्सरा के नाम पर है, तो उनके भेजे कुछ गण आ गए, मेरी बेटी के स्कूल में, और पीछे पड़ गये लड़कियों के, ‘क्योंजी, तुम अंडा क्यों खाती हो’। ऐसे वैजेटेरियन एक्टिविज्म से अहिंसा नहीं बनती। अहिंसा बनती है, करुणा और संयम से। पूछना यह चाहिए कि क्या हमारी वर्तमान आधुनिकता सचमुच अहिंसा और करुणा से परिभाषित होती है? पूछना यह चाहिए कि यह आधुनिकता प्रकृति से मनुष्य के रिश्ते को कैसे देखती है?

आप यदि चाणक्यपुरी जाएँ, तो देखेंगे एक सड़क का नाम है, ‘एवरेस्ट विजेता तेनसिंग नोरगे मार्ग’। मुझे संदेह है कि स्वयं तेनसिंग ने कभी खुद को एवरेस्ट का विजेता माना होगा। वे भी मेरी तरह ही अंगूठा-टेक थे, उनकी परंपरा ने उन्हें यह नहीं सिखाया था कि आप एवरेस्ट शिखर पर पहुंच जाएं तो स्वयं को उसका विजेता मान लें। गंगा में बाढ़ आती है, हम अंग्रेजी अखबारों में पढ़ते हैं, “अनटेम्ड गंगा”। हिन्दी अखबारों में आम तौर से ऐसे एक्सप्रेशंस देखने को नहीं मिलते। बात संस्कारों की है। यूरोप का संस्कार ही है, नदी को, पूरी प्रकृति को पालतू बनाने का। उस पर विजय पाने का, और यह संस्कार स्वाभाविक रूप से, रोजमर्रा की जिन्दगी में, भाषा में झलकता है। अभी कुछ दिन पहले, दिलीप कैलाश-मानसरोवर गये थे. इनके साथ इनके एक मित्र थे, ऑस्ट्रेलिया के, उनके बारे में यह बताते थे, ईमेल पर, फोन पर। वे सज्जन हर पहाड़ को, हर दर्रे को जीतते चलते थे। बताते थे दिलीप कि यार बडे़ परेशान हैं हम लोग इससे, छोटी सी नाली पार कर लेता है, तो कहता है ‘हमने इसे जीत लिया’। यहाँ हनुमानजी समुद्र पार कर के लंका हो आए, कोई हिन्दू नहीं कहता कि हनुमानजी ने समुद्र को जीत लिया। मित्रो, बात मजाक की नहीं है। मैक्स बेवर ने गंभीर विचार किया है इस सवाल पर प्रोटेस्टेंट एथिक्स और उसके कारण पूंजीवाद यूरोप में ही क्यों संभव हुआ, कहीं और क्यों नहीं। उन्होंने विचार चीन के प्रसंग में किया है, और इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि चीन में प्रोटेस्टेंट एथिक्स इसलिये नहीं आ सका, क्योंकि चीनी लोग प्रकृति पर विजय प्राप्त करने में इंटरेस्टेड नहीं थे। पूंजीवाद और आधुनिकता के उदय के बारे में बेवर के निष्कर्ष निराधार हैं, लेकिन जो बात ऐसी बातों से निकलती है, वह महत्वपूर्ण है, और वह बात यह है कि प्रकृति के साथ हिंसा हमारी वर्तमान आधुनिकता की जन्मकुंडली में ही विराजमान है। और इसलिए, जब तक हम इस हिंसक आधुनिकता की गाँधीजी द्वारा की गयी क्रिटीक के मर्म को नहीं समझते, जब तक हम गाँधीजी द्वारा इस हिंसक आधुनिकता को शैतानी सभ्यता कहने के मर्म को नहीं समझते, जब तक गाँधीजी के उस प्रसिद्ध चुटकुले में कि ‘वेस्टर्न सिविलिजेशन विल बी एन इंटरेस्टिंग आइडिया’, इस में निहित मूलगामी आलोचना को नहीं समझते, तब तक इस सभ्यता और इस आधुनिकता की मूल समस्या को नहीं समझ सकते। सभ्यता का अर्थ ही इस आधुनिकता में मान लिया गया है - प्रकृति के साथ हिंसा का संबंध। इसी संबंध से इस सभ्यता का औद्योगीकरण उत्पन्न होता है, और इसी संबंध से ‘खाओ, पियो, मौज करो’ की मानसिकता उत्पन्न होती है।

मित्रो, गाँधीजी को औद्योगीकरण मात्र का विरोधी माना जाता है, मैं स्पष्ट कर दूँ, मैं औद्योगीकरण का विरोधी बिल्कुल नहीं हूँ। मैं मद्यपान को कोई बहुत बडा़ इशू नहीं मानता। गाँधीजी मानते थे। इसीलिए मैंने शुरु में ही कहा कि मैं गाँधीजी को प्राफेट या मसीहा के तौर पर नहीं, प्रस्थान के तौर पर लेता हूँ। हम प्रस्थान के तौर पर ही इस बात को लें कि अहिंसा का अर्थ है संयम और करुणा। और इस प्रस्थान से शुरु करें। इस बात का ध्यान रखें कि गाँधीजी कोई एकाएक पैदा हो गये व्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में सैकडों़ साल से चले आ रहे आत्मसंघर्ष की परिणति थे। वे स्वयं अपने आप को उस आत्मसंघर्ष में ही लोकेट करते थे, इसीलिए बेधड़क भाव से स्वयं को सनातनी हिन्दू कहते थे, और उतने ही बेधड़क भाव से स्वयं को ईसाई और मुसलमान भी कहते थे। 1907 या 8 में वह मार्मिक घटना हुई थी- फीनिक्स आश्रम में। जोसेफ रायप्पन नाम के एक ईसाई साथी थे, गाँधीजी के। उन्होंने एक दिन कहा कि ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए’ में ‘वैष्णव’ के स्थान पर ‘ईसाई’ रख के क्यों न गाएं इस भजन को। सुझाव तुरंत मान लिया गया, और इसके बाद इस भजन के कई संस्करण गाँधीजी के जीवन के अंतिम दिनों तक चलते रहे। ‘क्रिस्तान जन तो तेणे कहिए...’ ‘मुस्लिम जन तो तेणे कहिए...’ कोई असुविधा नहीं हुई गाँधीजी को, कोई असुविधा नहीं हुई उनके जैसे, और मेरी माँ जैसे करोडों़ लोगों को। और ऐसे लोग इस देश में अभी भी हैं, इसीलिए देश चल भी रहा है, क्योंकि इस देश के करोडों़ साधारण जन जानते हैं कि असली बात तो एक ही है - ‘पीर पराई जाणे रे...’।

गाँधीजी और उनके जैसे परंपरा से जुडे़ लोगों के आत्मसंघर्ष और उससे जन्मी आधुनिकता को देखें, तो एक विश्वास बनता है कि प्रकृति के साथ हिंसा पर आधारित आधुनिकता, शैतानी सभ्यता के बरक्स एक अहिंसक आधुनिकता, एक मानवीय सभ्यता भी संभव है। जिसमें जरूरी तौर से औद्योगीकरण का, रेल, कार का, और अस्पतालों का निषेध नहीं होगा, लेकिन प्रकृति के प्रति सोच के जिसके तरीके भिन्न होंगे। जिसमें नागरिकों के परस्पर विवादों के बारे में रवैया यह होगा कि विवाद मोहल्ले, गांव या कस्बे में ही निबट जाए तो बेहतर। जिसमें विभिन्न प्रकार के प्राफेशनल्स अपने प्राफेशन को ही एक वेस्टेड इंटरेस्ट बनाए बिना अपनी सेवाएं प्रस्तुत करें। ऐसी आधुनिकता की परिकल्पना संभव है जिसमें कोई देश न्यूक्लियर वैपन्स को अपनी ताकत के प्रमाणों की तरह पेश करने की बजाय, इस पर गर्व करे कि हमारे यहाँ लोग एब्स्ट्रैक्ट एंगर की गिरफ्त में नहीं हैं, रोडरेज के शिकार नहीं बन रहे हैं।

बत्तीस साल हो गये, मुझे इस महानगर में रहते हुए, पिछले कुछ बरसों से ही रोडरेज के बारे में सुन रहा हूँ। आपकी गाडी़ किसी वजह से मेरी गाडी़ के आगे रुक गयी है। जानबूझ कर या मजबूरी में आप साइड नहीं दे पा रहे हैं। मेरे आगे बढ़ने में बाधक बन रहे हैं, मैं गाडी़ से उतरता हूँ, आपको गोली मार देता हूँ। मेरी प्रगति का मामला ठहरा! आप आडे़ आ रहे हैं। धीरज रखना, संतोषी होना जिस सभ्यता में मूर्खता और पिछडे़पन का प्रमाण मान लिया जाए, रोडरेज उस सभ्यता में निहित हिंसा का एक रूप ही तो है, और यह अकेला रूप नहीं है। मेरे मन में क्रोध भरा हुआ है, मुझे पता ही नहीं है कि क्यों क्रुद्ध हूँ मैं, और यह क्रोध, अकारण क्रोध - इसी को मैंने कहा एब्स्ट्रैक्ट एंगर, यह एब्स्ट्रैक्ट एंगर उस पल आप पर निकल रहा है, किसी पर भी निकल सकता है। उस गुस्से का, जिसका कारण खुद गुस्सा करने वाले को नहीं पता, उस एब्स्ट्रैक्ट एंगर का शिकार कोई भी बन सकता है।

ऐसे एंगर को संभव करने वाली आधुनिकता का विकल्प संभव है। अहिंसक आधुनिकता की परिकल्पना संभव है, उसकी दिशा में काम किया जा सकता है। गाँधीजी यही तो कर रहे थे। उनके बाद भी दुनिया में बहुत से लोग ऐसे काम कर रहे हैं, हाँ, यह और बात है कि ऐसे अधिकांश लोग तथाकथित सभ्य समाजों की भाषाओं में - अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश में - काम नहीं करते, और इसीलिए इन्हीं भाषाओं के जरिए सभ्यता सीखने वाले जैसे हम सरीखे लोगों तक पहुँच नहीं पाते।

मित्रो, गाँधीजी के जन्म-शताब्दी वर्ष से एक साल पहले, 1968 में हिन्दी के अत्यंत महत्वपूर्ण लेखक जैनेन्द्र कुमार ने एक पुस्तक लिखी थी - ‘अकाल पुरुष गाँधी’। बहुत बडे़ लेखक और चिंतक थे, जैनेन्द्र कुमार। मैं उनकी इस पुस्तक के एक उद्धरण के साथ ही अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा - “एक वक्त आएगा जब लोग गाँधीजी को व्यर्थ मान लेंगे”। ध्यान दें, मित्रो, जैनेन्द्र यह बात 1968 में लिख रहे थे। तब तक लोग गाँधीजी को व्यर्थ मानने ही लगे थे। काफी ऊब गये थे उनसे। लेकिन फिर ध्यान दें, आगे जैनेन्द्र लिखते हैं, “लेकिन जल्दी ही एक समय आएगा जब गाँधीजी का पुनराविष्कार होगा, और यह पुनराविष्कार एक मिथक के रूप में होगा। वह व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन का चित्र और प्रतीक होगा। मैं मानता हूँ कि गाँधीजी का यह निर्वैयक्तिक रूप मानव इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात करेगा”।

मैं एकदम सहमत हूँ जैनेन्द्र जी से। फर्क इतना सा है कि जैनेन्द्र मानते थे, मैं थोडे़ अविनम्र भाव से कहना चाहता हूँ कि मैं जानता हूँ कि गाँधीजी के ऐसे निर्वैयक्तिक रूप से ही मानव इतिहास के नये युग का सूत्रपात होगा।

धन्यवाद, मित्रो।
- पुरुषोत्तम अग्रवाल

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