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चंपारण सत्याग्रह शताब्दी - संस्मरण-3

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी
संस्मरण-3

आचार्य कृपलानीजी की आत्मकथा से नीचे दिया प्रसंग अनुवादित किया है | आप जानते ही हैं कि कृपलानीजी चंपारण में गांधीजी के सहयोगी थे| तब उनकी उम्र २९ वर्ष की थी |


जयंत दिवाण
मो. 8652356740 | sampurna.kranti1975@gmail.com 

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बचपन से मुझे घुडसवारी का शौक था| एक दिन मैंने मेरे जमीनदार विद्यार्थी का घोडा सवारी के लिए लिया| बहुत महीनों से उस घोड़े पर किसीने सवारी नहीं की होगी ऐसा मुझे लगा| मैं जैसे ही जीन पर बैठा वह तीर जैसे दौड़ने लगा| मुझे लगा अगर यह किसी सख्त वस्तु पर टकरायेगा तो मैं फेंका जाऊंगा| यह सोचकर मैं कुशलता से उसकी पीठ से कूद पड़ा| मेरे दोनों पाँव छील गये| उस वक्त पुलीस सुपीरीटेंडेट उस रास्ते से गुजर रहा था| जो कुछ घटा वह उसने देखा था| दूसरे दिन उसने मुझपर बेदरकारी से घुडसवारी करने पर फौजदारी मुकदमा दर्ज किया| घोड़ा बेकाबू हो गया था उसमें मेरा कोई दोष नहीं था यह वह जनता था| इस मुकदमें के संदर्भ में मैंने गांधीजी से सलाह मांगी| मुझे पता था कि बेदरकारी से घुडसवारी करने पर मुझे थोड़ा दंड भरना पड़ेगा| अगर यह आरोप झूठ होगा तो भी मैं यह दंड भरू? उन्होंने कहा की, जो कुछ घटा वह सुपरीटेंडेट जनता है| उसके बावजूद उसने फौजदारी मुकदमा दर्ज किया है| उसका हेतू राजनीतिक है| वह लोगों पर ऐसी छाप छोड़ना चाहता है की सरकार गांधीजी के साथियों से कुछ भी कर सकती है| इसलिए, मजिस्डेट दंड करे तो मुझे दंड न भरते हुए जेल जाना पसंद करना चाहिये| दूसरे दिन मैं अदालत के समक्ष हाजिर हुआ| मैंने कहा की यह बेदरकारी से घुडसवारी करने का बनाव नहीं था| लेकिन घोडा बेकाबू होने का बनाव था| जख्म मुझे हुई थी| बूढ़ी तो डर से गीर गयी थी| और उसे कोई चोट हुई नहीं थी| सुपरीटेंडेट को खुदकी जुबानी में कबुल करना पड़ा की घोडा बेकाबू दौड़ रहा था|उस पर से उतरने में मैंने बहुत ही समय सूचकता व कुशलता दिखायी थी| इसके बावजूद वह बेदरकारी से घुडसवारी करना ही था| इस बात का उसने आग्रह रखा| मजिस्डेट ने उसकी बात मान्य की| मुझे बेदरकारी से घुडसवारी करने के लिए दोषी ठहराया और चालीस रुपयों का दंड दिया| (सन १९१७ के चालीस रूपये) दंड न भरने पर पंधरा दिन की सधी कैद की सजा सुनायी| मैंने दंड भरना नकारा और मुझे अदालत में से स्थानीय जेल में ले जाया गया| पंधरा दिन जाने में कितना समय लगता है? उस वक्त कैदियों के वर्ग नहीं थे| जब मुझे छोड़ने का समय आया तब मैंने जेलर से कहा की सुबह होने से पहले छोड़ दो| जेल के दरवाजे पर कोई दिखावा हो यह मैं चाहता नहीं| इस सूचना पर वह राजी हो गया| और कोई जेल के दरवाजे आयें उससे पहले ही मुझे छोड़ दिया| मैं चलते हुए हमारे मुकामतक पहुँच गया| थोड़ी देर बाद दिखावा करनेवाले आये और कहने लगे की हम जेल से निराश होकर लौट रहे हैं| आपको सुबह होने तक रुकना चाहिये था| जेल-जीवन का यह मेरा पहला अनुभव था| बहुत से अख़बारों ने इसका सत्याग्रह तरीके से वर्णन किया था| मेरे ऊपर का केस राजनीतिक हेतु से प्रेरित था| इसके बावजूद दंड न भरने के बदले में जेल जाने से सत्याग्रह कैसे हुआ यह मेरा समझ में नहीं आया| यह अगर सत्याग्रह का बनाव कहा जाए तो यह बहुत सस्ता सत्याग्रह था!

- आचार्य कृपलानी
संदर्भ- आचार्य कृपलानीनी आत्मकथा , अनु. नगीनदास पारेख गुर्जर ग्रंथरत्न कार्यालय, अहमदाबाद, सन १९९४ (गुजराती)


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जे.बी. कृपलानी


जे.बी. कृपलानी जी का पूरा नाम था जीवतराम भगवानदास कृपलानी (जन्म १८८८ ) मुझफ्फरपुर के सरकारी कालेज में वे प्रोफेसर थे | उसी समय उनकी गांधीजी से रविन्द्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में भेट हुयी थी | उन्होंने गांधीजी के चंपारण सत्याग्रह में भाग लिया था | कुछ वर्ष
वे गांधी द्वारा अहमदाबाद में स्थापित गुजरात विद्यापीठ के प्रमुख थे | सन १९२७ से उन्होंने अपना जीवन कांग्रेस व रचनात्मक कार्य के लिए समर्पित किया | आज़ादी की लड़ाई में गांधीजी के तीनों महत्त्वपूर्ण आंदोलनों में उन्होंने जेल की सजा भोगी | १९४६ में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बने | व्हिजिल साप्ताहिक के वे संपादक थे | समाजवादी पार्टी की स्थापना में उनकी भूमिका थी | वह लोकसभा के सदस्य थे | १९८२ में उनका निधन हुआ |


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